बैंक सरकारी नहीं, फिर भी 1914 एक्ट से वसूली!—मद्रास हाई कोर्ट के बड़े फैसले के बाद नई बहस तेज
नई दिल्ली/पटना। देशभर में बैंक लोन वसूली की प्रक्रिया को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। हाल ही में सामने आए दस्तावेज़ों और अदालत के फैसलों से स्पष्ट हुआ है कि भारत का कोई भी बैंक—यहाँ तक कि RBI—को भी “सरकारी” बैंक नहीं माना जाता, फिर भी कई बैंक उड़ीसा-बिहार पब्लिक डिमांड्स रिकवरी एक्ट 1914 का उपयोग कर वसूली करने की कोशिश करते हैं।
मद्रास हाई कोर्ट का साफ फैसला
2019 में Madras High Court की डिवीजन बेंच (Justice K.K. Shashidharan & Justice P.D. Adikesavulu) ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया:
“RBI और अन्य बैंकों के कर्मचारी सरकारी कर्मचारी नहीं हैं।”
यह फैसला E. Manoj Kumar v. TNPSC केस में आया था।
फिर बड़ा सवाल—क्या बैंक 1914 एक्ट का इस्तेमाल कर सकते हैं?
कानून कहता है कि 1914 Act केवल सरकारी बकाया/राजस्व की वसूली के लिए बना है।
चूँकि बैंक सरकारी विभाग नहीं हैं, इसलिए इस एक्ट से लोन वसूली नहीं की जा सकती।
इसके बावजूद कई बैंक 1914 Act के तहत certificate case दर्ज कर देते हैं, जिसे अदालतें बार-बार ग़ैरकानूनी ठहरा चुकी हैं।
अदालतों ने कई बार रोका बैंक का गलत इस्तेमाल
SBI बनाम Borrower (1986-87) में अदालत ने साफ कहा:
“Loan dues को public demand नहीं माना जा सकता; PDR-1914 का प्रयोग नहीं होगा।”
2022 में Patna High Court ने भी दोहराया कि केवल सरकारी या विशेष अधिनियम से जुड़े बकाया ही ‘पब्लिक डिमांड’ हैं, बैंक लोन नहीं।
बैंक की सही वसूली प्रक्रिया क्या है?
- नोटिस / रिमाइंडर
- EMI पुनर्गठन / सेटलमेंट
- लीगल नोटिस
- DRT (1993 Act)
- SARFAESI (secured loans पर नीलामी)
- सिविल कोर्ट
यानी 1914 Act इस प्रक्रिया का हिस्सा ही नहीं।
क्यों कर रहे हैं बैंक 1914 एक्ट का इस्तेमाल?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि कई बैंक अभी भी
“पुरानी प्रक्रिया” या “easy shortcut” समझकर ऐसा करते हैं।
लेकिन यह तरीका चुनौती देने पर गिर जाता है, क्योंकि बैंक सरकारी नहीं हैं।
निष्कर्ष
Madras High Court के स्पष्ट निर्णय और अन्य अदालतों के फैसलों ने स्थिति साफ कर दी है:
**🔹 बैंक सरकारी नहीं
🔹 बैंक अधिकारी सरकारी नहीं
🔹 बैंक लोन 1914 Act से recover नहीं किया जा सकता
🔹 ऐसी recovery को कोर्ट में आसानी से चुनौती दी जा सकती है**












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