कहलगांव विधानसभा सीट पर दिलचस्प मुकाबला: रजद बनाम जदयू, कांग्रेस के लिए कठिन राह
Interesting contest on Kahalgaon Assembly seat: RJD vs JDU, tough road ahead for Congress.”
बिहार विधानसभा चुनाव में जहां मोकामा सीट जैसी कई हॉट सीटों पर सभी की निगाहें टिकी हैं, वहीं भागलपुर जिले की कहलगांव विधानसभा सीट भी इस बार बेहद दिलचस्प मुकाबले की वजह से सुर्खियों में है। यहां इंडिया गठबंधन के घटक दल कांग्रेस और राजद आमने-सामने हैं, जिससे राजनीतिक समीकरण उलझते नजर आ रहे हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कहलगांव सीट का राजनीतिक इतिहास बेहद पुराना और गौरवशाली रहा है। इस सीट पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता स्वर्गीय सदानंद सिंह आठ बार विधायक रह चुके हैं। यही कारण है कि कांग्रेस अब भी इस सीट को अपनी परंपरागत सीट मानती है। हालांकि, सदानंद सिंह के निधन के बाद उनके पुत्र शुभानंद सिंह को कांग्रेस ने पिछले चुनाव में टिकट दिया था, लेकिन वे जीत हासिल नहीं कर पाए। इसके बाद शुभानंद ने कांग्रेस छोड़कर जदयू का दामन थाम लिया और इस बार वे जदयू उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं।
पवन यादव का बगावती तेवर
पिछले चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार शुभानंद सिंह को हराने वाले बीजेपी प्रत्याशी पवन यादव ने इस बार पार्टी से बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। बीजेपी ने उन्हें पार्टी से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है। यह बगावत एनडीए के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।
इंडिया गठबंधन में टकराव
इंडिया गठबंधन की ओर से इस सीट पर दो प्रत्याशी मैदान में हैं।
पहले हैं कांग्रेस के प्रवीण सिंह कुशवाहा, जो पापरी बोस कांड के आरोपी बताए जा रहे हैं और स्थानीय मतदाताओं में खास लोकप्रिय नहीं माने जा रहे।
दूसरे हैं राजद के युवा प्रत्याशी रजनीश यादव, जो यूके से उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं और अपने सधे हुए राजनीतिक दृष्टिकोण और सामाजिक जुड़ाव के लिए चर्चित हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, मुख्य मुकाबला रजद के रजनीश यादव और जदयू के शुभानंद सिंह के बीच है।
जातीय समीकरण और मतदाताओं का रुख
कहलगांव विधानसभा क्षेत्र में अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है। एनआरसी और सीएए के मुद्दे को लेकर इन समुदायों में जदयू के प्रति नाराजगी देखी जा रही है, जिसका सीधा फायदा रजद उम्मीदवार को मिल सकता है।
इसके अलावा, यहां मंडल जाति (गंगोता), यादव और कुर्मी समाज का भी महत्वपूर्ण वोट बैंक है।
माना जा रहा है कि रजनीश यादव को इन वर्गों के साथ-साथ युवाओं और अल्पसंख्यकों का भी मजबूत समर्थन मिल सकता है।
मोकामा से प्रभाव
वहीं मोकामा में दुलारचंद यादव की हत्या ने पूरे बिहार के पिछड़े, दलित और शोषित वर्गों को एकजुट करने का काम किया है, जिसका अप्रत्यक्ष फायदा भी रजद प्रत्याशी रजनीश यादव को मिल सकता है।
निष्कर्ष
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कहलगांव सीट पर इस बार मुकाबला रोमांचक और ऐतिहासिक होने वाला है।
एक तरफ सत्ता पक्ष के उम्मीदवार शुभानंद सिंह हैं, तो दूसरी ओर विपक्ष की तरफ से युवा और पढ़े-लिखे रजनीश यादव।
वर्तमान परिस्थितियों और मतदाताओं के रुझान को देखते हुए, रजद उम्मीदवार का पलड़ा इस बार भारी माना जा रहा है।















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