‘मृ..त शिक्षा व्यवस्था’ की निकली अर्थी: कॉकरोच आंदोलनकारियों ने चर्च के सामने किया अनोखा प्रदर्शन, फूट-फूट कर रोए प्रदर्शनकारी
नई दिल्ली। शिक्षा व्यवस्था में कथित गिरावट, पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और युवाओं के भविष्य को लेकर मंगलवार को राजधानी दिल्ली में कॉकरोच आंदोलनकारियों ने बेहद अनोखे अंदाज में विरोध-प्रदर्शन किया। आंदोलनकारियों ने शिक्षा व्यवस्था को “मृत” बताते हुए उसका प्रतीकात्मक पुतला तैयार किया, उसका सिर मुंडवाया, सफेद कफन में लपेटकर चर्च के सामने अर्थी की तरह लिटाया और उसका अंतिम संस्कार एवं शोकसभा का प्रतीकात्मक आयोजन किया।
प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में छात्र, युवा और अन्य लोग मौजूद रहे। कई प्रदर्शनकारी फूट-फूटकर रोते दिखाई दिए। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था के पुतले के सामने विलाप किया, श्रद्धांजलि अर्पित की और “शिक्षा व्यवस्था मर गई” के नारे लगाए। पूरे प्रदर्शन का उद्देश्य सरकार का ध्यान शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं और युवाओं के भविष्य की ओर आकर्षित करना बताया गया।
प्रदर्शन के दौरान कुछ आंदोलनकारियों ने सरकार पर व्यंग्य करते हुए कहा कि “सरकार तो मेलोडी खाकर रो रही है। अगर प्रधानमंत्री मेलोडी नहीं खाते, तो शिक्षा व्यवस्था बच जाती।” यह टिप्पणी प्रदर्शनकारियों की ओर से राजनीतिक कटाक्ष के रूप में की गई। प्रदर्शन के दौरान इस तरह के नारे भी लगाए गए और सरकार से शिक्षा व्यवस्था को बचाने की मांग की गई।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि लगातार पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियां, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और पारदर्शिता की कमी के कारण लाखों छात्रों का भविष्य संकट में पड़ गया है। उनका कहना था कि शिक्षा व्यवस्था में छात्रों का भरोसा टूट चुका है, इसलिए उन्होंने प्रतीकात्मक रूप से इसे “मृत” घोषित कर अंतिम विदाई देने का नाटकीय प्रदर्शन किया।
प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए, भर्ती प्रक्रियाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो और युवाओं के भविष्य के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ बंद किया जाए। उनका कहना था कि जब तक शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार नहीं किए जाते, तब तक उनका आंदोलन विभिन्न रूपों में जारी रहेगा।
(नोट: “मेलोडी” और प्रधानमंत्री से जुड़ी टिप्पणी प्रदर्शनकारियों द्वारा प्रदर्शन के दौरान दिया गया राजनीतिक बयान है। इसे उनके दावे/कथन के रूप में ही देखा जाना चाहिए।)
