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गोड्डा नगर राजनीति में नया अध्याय? खामोश मेहनत से चर्चा के केंद्र में प्रीतेश नंदन

Edit By: Samcharaajtak Portal Team

गोड्डा।

जैसे ही नगर निकाय चुनाव की आहट गोड्डा में सुनाई देने लगी है, वैसे ही पूरा शहर मानो सियासी फ़िल्म के पहले सीन में तब्दील हो गया है। चाय की दुकानों, चौक-चौराहों और मोहल्लों की बैठकों में एक ही सवाल गूंज रहा है—इस बार नगर अध्यक्ष की कुर्सी किसके हिस्से जाएगी?

दावेदार कई हैं और नाम भी मजबूत बताए जा रहे हैं, लेकिन इस बार जो नाम सबसे तेज़ी से आम लोगों की जुबान पर चढ़ा है, वह किसी बड़े पोस्टर, होर्डिंग या शोर-शराबे वाले प्रचार की देन नहीं है। यह नाम ज़मीन पर की गई खामोश मेहनत, लोगों के बीच बनी भरोसे की पकड़ और लगातार सामाजिक जुड़ाव का नतीजा है—और यही वजह है कि गोड्डा की राजनीति में प्रीतेश नंदन का नाम अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे एक मज़बूत कहानी की तरह उभरता दिखाई दे रहा है।

प्रीतेश नंदन की पहचान एक युवा समाजसेवी और व्यवसायी के रूप में रही है, जो अक्सर कैमरों और सुर्खियों से दूर रहकर ज़मीनी स्तर पर सक्रिय रहते हैं। ज़रूरतमंद परिवारों की मदद हो या किसी संकट में फँसे व्यक्ति का साथ—उनकी मौजूदगी प्रचार से ज़्यादा भरोसे में दिखती है। यही भरोसा आज उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी बनता नज़र आ रहा है। लोग उन्हें भाषणों से नहीं, बल्कि उनके कामों से पहचान रहे हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि की बात करें तो प्रीतेश नंदन झारखंड मुक्ति मोर्चा के गोड्डा जिला अध्यक्ष प्रेमनंदन कुमार मंडल के पुत्र हैं। संगठन की कार्यशैली, कार्यकर्ताओं की नब्ज़ और चुनावी रणनीति उनके लिए नए विषय नहीं हैं। लेकिन इस चर्चा का सबसे अहम पहलू यह है कि जिस सामाजिक वर्ग से प्रीतेश नंदन आते हैं, वही वर्ग नगर अध्यक्ष चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। पिछली बार गुड्डू मंडल की जीत ने यह साफ कर दिया था कि इस समाज की एकजुटता चुनावी नतीजों को किस तरह प्रभावित कर सकती है।

ऐसे में इस बार प्रीतेश नंदन को लेकर तेज़ होती चर्चा महज़ कयास नहीं, बल्कि बदलते सियासी समीकरणों का संकेत मानी जा रही है। अब सवाल यह नहीं रह गया है कि उनका नाम क्यों उभर रहा है, बल्कि सवाल यह है कि क्या गोड्डा की नगर राजनीति एक नए चेहरे, नई कार्यशैली और नई सोच के लिए तैयार है?

क्योंकि चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होते—चुनाव भरोसे से जीते जाते हैं। और अगर भरोसे को सही चेहरा मिल जाए, तो सियासत की पूरी पटकथा ही बदल सकती है।

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