गोड्डा।
कानून की प्रक्रिया लंबी हो सकती है, लेकिन उसका विकल्प हिंसा नहीं हो सकता। पोड़ैयाहाट थाना क्षेत्र के मटिहानी गांव के समीप बीती रात जो हुआ, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अब शक ही सज़ा का आधार बनता जा रहा है?
घटना में पथरगामा थाना क्षेत्र के रानीपुर निवासी पप्पू अंसारी की लाठी-डंडों से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। सूचना मिलते ही इलाके में अफरा-तफरी मच गई। शुरुआती तथ्यों के अनुसार यह मामला भीड़ द्वारा की गई हत्या (मॉब लिंचिंग) का हो सकता है।
बताया जा रहा है कि मृतक पर मवेशी चोरी का संदेह जताया गया था। ग्रामीणों का कहना है कि वह पूर्व में ऐसे मामलों में जेल जा चुका था। लेकिन सवाल यह नहीं है कि आरोप पुराने थे या नए—सवाल यह है कि क्या किसी के अतीत के आधार पर वर्तमान में उसकी जान लेने का हक किसी को मिल जाता है?
कानून स्पष्ट है। चोरी हो या कोई अन्य अपराध, निर्णय अदालत करती है, न कि गुस्से में जमा हुई भीड़। इस घटना में भीड़ ने न केवल कानून को नजरअंदाज किया, बल्कि मानवता की सीमाएं भी लांघ दीं।
पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और मामले की छानबीन शुरू कर दी है। अधिकारियों के अनुसार, घटना में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है और दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।
यह वारदात केवल एक व्यक्ति की मौत की कहानी नहीं है, बल्कि उस खतरनाक सोच का संकेत है, जिसमें कानून पर भरोसा कमजोर और हिंसा पर विश्वास मजबूत होता जा रहा है। अगर इसी तरह फैसले सड़कों पर होने लगे, तो न्यायालयों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगेंगे।
अब जरूरत है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो, सच सामने आए और यह संदेश जाए कि कानून अपने हाथ में लेने वालों के लिए भी कानून उतना ही सख्त है। क्योंकि भीड़ का न्याय अंततः समाज को ही कठघरे में खड़ा करता है।














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