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Truth Over Fear

गोड्डा में हाइवा ट्रक का आतंक कब रुकेगा? गोड्डा में बेलगाम हाइवा, आम आदमी बन रहा शिकार

गोड्डा।

आखिर कब तक गोड्डा की सड़कों पर हाइवा (हाइवा ट्रक) का आतंक यूं ही चलता रहेगा? आए दिन कोई न कोई निर्दोष आम नागरिक इन बेकाबू ट्रकों का शिकार हो रहा है, लेकिन प्रशासन की आंखों पर मानो पट्टी बंधी हुई है। हाइवा चालक सड़क पर ऐसे फर्राटा भरते हैं, जैसे उनके लिए कानून नाम की कोई चीज़ हो ही नहीं और सड़क पर चलने वाला आम इंसान उनकी नजर में कीड़े-मकोड़े से ज़्यादा कुछ नहीं।

 

एक तरफ प्रशासन बिना हेलमेट, बिना काग़ज़, बिना लाइसेंस और बिना इंश्योरेंस के नाम पर मोटरसाइकिल सवारों का चालान काटने में पूरी सख़्ती दिखाता है, वहीं दूसरी ओर मौत बनकर दौड़ते हाइवा ट्रकों पर नज़र क्यों नहीं जाती? आखिर हाइवा चालकों के लाइसेंस, फिटनेस और प्रशिक्षण की जांच क्यों नहीं होती? क्या कानून सिर्फ़ दोपहिया चालकों के लिए ही बना है?

 

ताज़ा हादसा: सवालों के घेरे में प्रशासन

 

ताज़ा मामला झारखंड के गोड्डा जिले के हनवाड़ा थाना क्षेत्र अंतर्गत शहजादपुर चौक के पास का है। गुरुवार को दिनभर मेहनत-मजदूरी करने के बाद ट्रैक्टर पर सवार होकर घर लौट रहे मजदूरों को पीछे से तेज़ रफ्तार हाइवा ने जोरदार टक्कर मार दी और चालक मौके से फरार हो गया।

टक्कर इतनी भीषण थी कि ट्रैक्टर करीब 8 फीट गहरे गड्ढे में जा गिरा। मौके पर चीख-पुकार मच गई। सूचना मिलने पर पुलिस पहुंची और घायलों को इलाज के लिए गोड्डा सदर अस्पताल रेफर किया गया। ट्रैक्टर पर सवार आठ मजदूर इस हादसे का शिकार बने।

 

बिना प्रशिक्षण, बिना लाइसेंस—फिर भी सड़क पर

 

सूत्रों की मानें तो अधिकांश हाइवा चालक न तो प्रशिक्षित हैं और न ही उनके पास वैध लाइसेंस होता है। कुछ दिन खलासीगिरी करने के बाद उन्हें सीधे ड्राइवर की सीट पर बैठा दिया जाता है। 22–23 साल के युवा, बिना किसी प्रशिक्षण के, भारी भरकम हाइवा चलाने को मजबूर किए जाते हैं। ऊपर से हाइवा मालिक दिन में तीन-चार चक्कर लगाने का दबाव बनाते हैं। नतीजा—तेज़ रफ्तार, थकान और लापरवाही, जो जानलेवा हादसों में बदल जाती है।

 

सवाल जो गोड्डा पूछ रहा है

आखिर हाइवा चालकों पर कार्रवाई  क्यों नहीं?

क्या भारी वाहनों के लिए कानून अलग है?

जिन हाइवा ट्रकों से घरों के चिराग बुझ रहे हैं, उन पर सख़्ती क्यों नहीं?

क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा?

गोड्डा आज यह सवाल कर रहा है कि हाइवा का यह आतंक आखिर कब रुकेगा? या फिर आम आदमी यूं ही सिस्टम की अनदेखी की कीमत अपनी जान देकर चुकाता रहेगा?

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