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गोड्डा अडानी परियोजना के महंगी बिजली से दबाव में बांग्लादेश की ऊर्जा व्यवस्था, पुनर्विचार की सिफारिश

Edit By: Shahin Khan 

गोड्डा। बांग्लादेश की ऊर्जा सुरक्षा और सरकारी वित्त पर बढ़ते दबाव के बीच, भारत से आयात की जा रही बिजली की लागत एक बड़े नीति प्रश्न के रूप में सामने आई है। बांग्लादेश सरकार द्वारा गठित नेशनल रिव्यू कमेटी (एनआरसी) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड के गोड्डा में स्थित अडानी पावर का कोयला आधारित बिजली संयंत्र देश की बिजली जरूरतें तो पूरी कर रहा है, लेकिन इसकी ऊंची कीमतें लंबे समय में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकती हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह परियोजना अपने नजदीकी निजी प्रतिस्पर्धियों की तुलना में करीब 40 प्रतिशत अधिक दर पर बिजली उपलब्ध कराती है। समिति का मानना है कि इस महंगी आपूर्ति के कारण बांग्लादेश को न केवल तत्काल वित्तीय दबाव झेलना पड़ रहा है, बल्कि भविष्य में बिजली दरों में स्थिरता बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

एनआरसी ने इस ओर भी ध्यान दिलाया है कि अडानी की यह परियोजना बांग्लादेश की कुल बिजली आपूर्ति का 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सा देती है। ऐसे में किसी एक महंगे स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से जोखिम बढ़ा सकती है। समिति के अनुसार, सीमा-पार बिजली खरीद के मामलों में आमतौर पर कंपनियां अपने देश में लगने वाला कॉरपोरेट टैक्स खुद वहन करती हैं, लेकिन इस समझौते में टैक्स लागत को भी बिजली दरों में जोड़ दिया गया है, जिससे बांग्लादेश की कुल भुगतान जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि यदि मौजूदा शर्तों पर ही बिजली खरीद जारी रही, तो सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ सकता है। इसी वजह से समिति ने सिफारिश की है कि भारत से बिजली आयात से जुड़े सभी बड़े अनुबंधों की समीक्षा की जाए और जहां संभव हो, वहां लागत घटाने के लिए दोबारा बातचीत की जाए।

वहीं, अडानी पावर का कहना है कि वह बांग्लादेश को लगातार बिजली आपूर्ति कर रही है, जबकि भुगतान से जुड़ी बकाया राशि अब भी लंबित है। कंपनी के अनुसार, इस आपूर्ति से बांग्लादेश को ग्रिड स्थिरता बनाए रखने में मदद मिली है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ़ एक कंपनी या एक परियोजना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बांग्लादेश की दीर्घकालिक ऊर्जा नीति से जुड़ा सवाल है—क्या देश को महंगी आयातित बिजली पर निर्भर रहना चाहिए या वैकल्पिक, सस्ते और घरेलू स्रोतों पर अधिक जोर देना चाहिए।


 

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