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Truth Over Fear

भेड़-बकरी से भी सस्ती ज़िंदगी? DBL ट्रक हादसे ने गरीब की हैसियत पर उठाए सवाल DBL के ट्रक की टक्कर… और गोड्डा में एक साथ उजड़ गईं तीन ज़िंदगियाँ

रिपोर्ट: शाहीन खान

गोड्डा।

गोड्डा ज़िले में शुक्रवार की शाम जो हुआ, वह सिर्फ़ एक सड़क दुर्घटना नहीं थी—
वह एक पूरे परिवार की ज़िंदगी को रौंद देने वाली त्रासदी थी।

पाथरगामा थाना क्षेत्र के निवासी 25 वर्षीय सुबोध महतो, पेशे से राजमिस्त्री और परिवार का इकलौता कमाने वाला, DBL कंपनी के ट्रक की टक्कर का शिकार हो गए। हादसे में सुबोध की मौके पर ही मौत हो गई।

सुबोध वही युवक था जिसकी गोद में सिर्फ़ एक साल की मासूम बेटी थी।
वही सुबोध, जिसकी पत्नी मानसिक रूप से अस्वस्थ है और जिसका इलाज रांची में चल रहा था।
वही सुबोध, जिसकी मेहनत की कमाई से माँ का सहारा, पत्नी का इलाज और बेटी का भविष्य टिका हुआ था।

शुक्रवार की शाम वह किसी जश्न में नहीं, बल्कि अपने ससुराल जमुआ जा रहा था।
लेकिन रास्ते में DBL के ट्रक ने उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए छीन ली।

हादसे के बाद सड़क पर सुबोध का शरीर पड़ा रहा,
लेकिन उसी सड़क पर बिखर गईं उसकी बेटी की मुस्कानें, उसकी पत्नी के इलाज की उम्मीदें और उसकी माँ की आख़िरी आस।

घर में मातम पसरा है।
माँ का रो-रोकर बुरा हाल है।
एक साल की बच्ची कुछ समझ नहीं पा रही कि उसका “पापा” अब कभी लौटकर नहीं आएगा।
और मानसिक रूप से बीमार पत्नी शायद यह भी नहीं समझ पा रही कि उसका सबसे बड़ा सहारा हमेशा के लिए चला गया।

दर्द और आक्रोश इस बात को लेकर और गहरा है कि ख़बर लिखे जाने तक सुबोध का पोस्टमार्टम तक नहीं हो पाया था।
इसके अलावा यह चौंकाने वाली बात है कि DBL कंपनी इस मौत को महज़ एक लाख रुपये का मुआवज़ा देकर निपटाने की कोशिश कर रही है।

सवाल उठना लाज़मी है—

  • क्या एक लाख रुपये सुबोध की जान की कीमत है?
  • क्या एक लाख में उसकी बेटी की परवरिश, पढ़ाई और भविष्य सुरक्षित हो जाएगा?
  • क्या एक लाख में उसकी बीमार पत्नी का इलाज ज़िंदगी भर चल सकेगा?
  • क्या एक लाख में उसकी माँ का उजड़ा सहारा लौट आएगा?

यह मुआवज़ा नहीं, बल्कि मामले को दबाने की कोशिश है।
यह इंसाफ़ नहीं, बल्कि गरीब की जान की सस्ती कीमत तय करने का प्रयास है।
अगर आज एक राजमिस्त्री की मौत एक लाख में निपटा दी गई,
तो कल किसी और मेहनतकश की मौत भी उतनी ही सस्ती समझी जाएगी।

सुबोध महतो भले ही अब इस दुनिया में नहीं रहा,
लेकिन वह पीछे छोड़ गया है—

  • एक मासूम बच्ची,
  • एक बीमार पत्नी,
  • और एक पूरी तरह टूट चुकी माँ

अब यह सिर्फ़ एक हादसे की ख़बर नहीं रही।
यह इंसाफ़ की माँग है, यह जवाबदेही की लड़ाई है।

यह घटना सिर्फ़ एक सड़क हादसा नहीं,
बल्कि एक कड़वा सच उजागर करती है—
कि बड़ी कंपनियों और पूंजीपतियों के सामने आम गरीब आदमी की हैसियत आज भेड़-बकरी से ज़्यादा नहीं रह गई है।


 

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