जो राज्य कभी अंधेरे से जूझता था, अब रोशनी बेचने को तैयार — झारखंड की ऊर्जा क्रांति
रांची | विशेष संवाददाता
जिस झारखंड को कभी बिजली की कमी, कटौती और बाहरी निर्भरता के लिए जाना जाता था, वही झारखंड अब ऊर्जा के क्षेत्र में नया इतिहास लिखने की दहलीज़ पर खड़ा है। वर्ष 2025 राज्य के लिए सिर्फ़ एक कैलेंडर वर्ष नहीं, बल्कि बिजली के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर निर्णायक मोड़ बनकर उभरा है।
राज्य सरकार की योजनाओं, केंद्र के सहयोग और निजी निवेश के मेल से झारखंड अब उस दौर से बाहर निकल रहा है, जहाँ मांग पूरी करने के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना मजबूरी थी। हालात तेज़ी से बदल रहे हैं और संकेत साफ़ हैं—झारखंड अब बिजली खरीदने वाला नहीं, बल्कि बेचने वाला राज्य बनने की तैयारी में है।
2026 की तस्वीर: उत्पादन में बड़ा उछाल
ऊर्जा विभाग के मुताबिक वर्ष 2026 तक राज्य की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता में हज़ारों मेगावाट की बढ़ोतरी तय मानी जा रही है। थर्मल पावर के साथ-साथ सोलर और वैकल्पिक ऊर्जा परियोजनाओं को गति दी गई है। वर्षों से अधूरी या बंद पड़ी परियोजनाओं को दोबारा पटरी पर लाया जा रहा है, जिससे उत्पादन का आधार मज़बूत हुआ है।
निजी निवेश से मिली रफ्तार
ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी ने राज्य की बिजली व्यवस्था को नई ताक़त दी है। पावर प्लांटों के आधुनिकीकरण, ट्रांसमिशन नेटवर्क के विस्तार और नए सब-स्टेशनों के निर्माण से सप्लाई सिस्टम कहीं अधिक सक्षम हुआ है। इसका सीधा असर लाइन लॉस में कमी और आपूर्ति की स्थिरता के रूप में सामने आ रहा है।
उपभोक्ताओं के लिए राहत की उम्मीद
सरकार का दावा है कि इस बदलाव का लाभ सीधे आम उपभोक्ताओं तक पहुँचेगा। आने वाले समय में ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में सस्ती, स्थिर और निर्बाध बिजली उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं। वर्षों पुरानी शिकायतें अब बीते दिनों की बात बन सकती हैं।
आत्मनिर्भर ऊर्जा, मज़बूत अर्थव्यवस्था
बिजली में आत्मनिर्भरता झारखंड की अर्थव्यवस्था को नई उड़ान देने वाली है। उद्योगों को स्थिर ऊर्जा, युवाओं को रोज़गार और राज्य को निवेश का भरोसा मिलेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बदलाव केवल झारखंड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूर्वी भारत के ऊर्जा संतुलन को भी नई दिशा देगा।
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