क्या भारत का रुपया सचमुच लूट का शिकार हुआ? क्या आज भी देश 300 साल पुरानी व्यवस्था में चल रहा है?
डॉ. देवेंद्र बल्हारा की पुस्तक ‘उलगुलान’ ने उठाए कई सवाल
नई दिल्ली। क्या कभी आपने सोचा है कि भारत का रुपया पहले सोने और चाँदी से जुड़ा था? क्या आज का कागजी रुपया उसी मूल्य का है? क्या देश पर बढ़ता कर्ज़ और रुपये की गिरती ताकत किसी पुरानी आर्थिक व्यवस्था का परिणाम है?
इन्हीं सवालों को लेकर लेखक डॉ. देवेंद्र बल्हारा ने अपनी नई पुस्तक ‘उलगुलान’ में कई दावे और तर्क प्रस्तुत किए हैं।
पुस्तक के अनुसार भारत की आर्थिक व्यवस्था में पिछले लगभग 300 वर्षों के दौरान ऐसे बदलाव हुए, जिनसे रुपये की वास्तविक ताकत कमजोर होती गई। लेखक का कहना है कि पहले रुपये को सोने-चाँदी से जोड़ा गया था, लेकिन धीरे-धीरे यह संबंध समाप्त कर दिया गया। इसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना और बाद की आर्थिक नीतियों के जरिए मौजूदा मुद्रा व्यवस्था विकसित हुई।
पुस्तक में 1835 के कॉइनेज कानून, 1882 के पेपर करेंसी एक्ट, 1935 में RBI की स्थापना, 1971 में गोल्ड स्टैंडर्ड की समाप्ति, 1991 के आर्थिक सुधार और 2016 की नोटबंदी जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए सवाल उठाए गए हैं कि क्या इनका असर आज भी देश की अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहा है।
लेखक पुस्तक में यह भी प्रश्न उठाते हैं कि यदि देश लगातार विकास कर रहा है, तो राष्ट्रीय कर्ज़ लगातार क्यों बढ़ रहा है? किसान आर्थिक संकट में क्यों हैं? और रुपये की क्रय शक्ति पहले जैसी क्यों नहीं रही?
‘उलगुलान’ केवल उत्तर देने की कोशिश नहीं करती, बल्कि पाठकों से यह भी पूछती है कि क्या भारत की वर्तमान आर्थिक व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा होनी चाहिए?
नोट: पुस्तक में व्यक्त विचार और दावे लेखक के हैं। इन विषयों पर इतिहास, कानून और अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों के अलग-अलग मत हैं। इसलिए पाठकों को पुस्तक के साथ-साथ आधिकारिक और स्वतंत्र स्रोतों का भी अध्ययन करना चाहिए।
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