झारखंड में JMM-कांग्रेस गठबंधन की दरार?

एकला चलो” की राह पर JMM, कांग्रेस के लिए रेड अलर्ट!

  • क्या JMM की बढ़ती ताकत कांग्रेस के लिए खतरा बन रही है?

  • झारखंड चुनाव परिणाम: कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का  समय

झारखंड में हुए हालिया विधानसभा चुनाव के परिणामों ने न केवल झामुमो (JMM) के राजनीतिक प्रभाव को मजबूत किया, बल्कि कांग्रेस के लिए भविष्य की चुनौती के संकेत भी दिए हैं। JMM ने जहां 34 सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी ताकत को साबित किया, वहीं कांग्रेस को अपने प्रदर्शन में गिरावट का सामना करना पड़ा।

2019 के 18 सीटों से घटकर इस बार कांग्रेस 16 सीटों पर सिमट गई। इस गिरावट और JMM के बढ़ते प्रभाव ने गठबंधन में शामिल दलों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।

JMM की रणनीति और बढ़ता प्रभाव

मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण समारोह का संकेत:
JMM ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अकेले शपथ दिलाकर यह स्पष्ट कर दिया कि गठबंधन में उसकी भूमिका प्रमुख है।

परंपरागत रूप से शपथ ग्रहण में सभी दलों के मंत्री शामिल होते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। यह JMM की “एकला चलो” की संभावित नीति का पहला संकेत हो सकता है।

आदिवासी और अल्पसंख्यक वोटों पर मजबूत पकड़:
JMM के पास आदिवासियों का कोर वोट बैंक पहले से ही मजबूत है। इसके साथ ही अल्पसंख्यक वोट भी JMM की ओर झुकते नजर आ रहे हैं। यदि भविष्य में JMM अकेले चुनाव लड़ती है, तो कांग्रेस और अन्य दलों को अल्पसंख्यक और आदिवासी वोटों का नुकसान हो सकता है।

 ओबीसी वोटरों को साधने की कोशिश:
JMM ने इस बार अपने मंत्रिमंडल में ओबीसी कोटे से दो विधायकों को जगह देकर यह स्पष्ट संदेश दिया कि वह ओबीसी वोटरों को अपनी ओर खींचने की रणनीति बना रही है। इसके विपरीत, कांग्रेस ने ओबीसी समुदाय को मंत्रिमंडल में कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया, जिससे इस वर्ग में नाराजगी पैदा हो रही है।

 

कांग्रेस की कमजोर होती स्थिति

कांग्रेस ने इस बार चार मंत्रियों को चुना, लेकिन इनमें ओबीसी वर्ग का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। यह फैसला उस समय आया जब राहुल गांधी “जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” का संदेश दे रहे हैं। यह विरोधाभास कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकता है, खासकर अगर JMM ने भविष्य में गठबंधन तोड़कर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया।

गठबंधन की दरार: राजद भी अलग राह पर?

राजद ने झारखंड में मंत्री तो बनाया, लेकिन वह ओबीसी कोटे से नहीं बल्कि “जनरल” श्रेणी में आते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि गठबंधन में सभी दल अपनी-अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर काम कर रहे हैं, जो भविष्य में मतभेद को बढ़ा सकता है।

भविष्य के लिए कांग्रेस को आत्ममंथन की जरूरत

JMM की बढ़ती ताकत और उसके संकेतों को नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। अगर भविष्य में JMM ने गठबंधन तोड़ने का फैसला किया, तो कांग्रेस को ओबीसी और अन्य वर्गों से वोट मांगने में कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। कांग्रेस आलाकमान को तुरंत इस स्थिति का विश्लेषण कर रणनीति बनानी चाहिए।

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– साजेब खान

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