कितनों की जान निकल गई उन्हें देख सहम जाता हूं, घर लौट भी पाऊंगा या नहीं यह सोच कर डर जाता हूं :-मनोज राही
-कितनों की जान निकल गई उन्हें देख सहम जाता हूं, घर लौट भी पाऊंगा या नहीं यह सोच कर डर जाता हूं
Godda :Migrate labour News:
आदिम काल से मजदूरों को लोगों ने मजबूर की संज्ञा दी है।जब भी विश्व में कोई आपदा आती है तो उसका शिकार सर्वप्रथम मजदूर ही होता है चाहे युद्ध का मामला हो, नोटबंदी का मामला हो या वर्तमान में चल रहे लॉक डाउन से उत्पन्न स्थिति के शिकार भी आज मजदूर ही हो रहे है।
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मजदूर के लिए यह कहावत चरितार्थ होती है की ” रास्ते का पत्थर किस्मत ने हमें बना दिया , जिस रास्ते से गुजरा एक ठोकरे लगा गया “
यूं तो मजदूरों के दर्दो को कई कवियों और साहित्यकारों ने अपनी रचनाएं में बयां करते आए हैं। वहीं आज गोड्डा के जाने-माने युवा कवि डॉ मनोज राही ने
प्रवासी मजदूरों का दर्द का बयां अपनी रचनाओं में इस तरह की है।
अपने गांव से बिछड़ने की सजा पाता हूं ,
दरबदर राहों पर भटकने की सजा पाता हूं,।।
चार पैसे कमाने की चाह में जान पर खेल जाता हूं,
मां की बेचैनी और बीवी बच्चों की धड़कने बढ़ाता हूं ।।
रोटी अपनी मिट्टी में भी है अक्सर भूल जाता हूं,
आज भूखे पेट घर लौटने को तरस जाता हूं ।।
कितनों की जान निकल गई उन्हें देख सहम जाता हूं,
घर लौट भी पाऊंगा या नहीं यह सोच कर डर जाता हूं।।
कितना मुश्किल है अपनों से दूर रहकर चार पैसे कमाना,
मगर देख के घर के हालात सब कुछ भूल जाता हूं ।।
ऐसे भी बिगड़ेंगे हालात कभी सोचा ना था राही”
लोग पैदल हजारों मील चलने को है मजबूर देख सिहर जाता हूं।।