मुलाकात का रिवाज खत्म सा हो गया है मिलना जुलना भी अब जुर्म हो गया है…

– मुलाकात का रिवाज खत्म सा हो गया है मिलना जुलना भी अब जुर्म हो गया है…

गोड्डा। वैश्विक महामारी बन चुकी कोरोना वायरस के कारणों से किए गए लॉक डॉउन के वजह से लोग अपने अपने घरों में कैद हो गए है, ऐसे में लोग अपने घरों में लोग घरेलू काम कर रहे हैं या फिर ज्यादातर समय मोबाइलों पर बिता रहे। इन सब के बीच गोड्डा के रहने वाले हर दिल अजीज “कवि डॉ मनोज कुमार राही” ने संकट के इस घड़ी में आज के मौजूदा परिदृश्य को अपने बेहतरीन गजलों में पिरो कर कुछ इस तरह बयान किया

मुलाकातों का रिवाज खत्म सा हो गया है,
मिलना जुलना भी अब जुर्म हो गया है ।।
घर से कोई ना निकले ये ऐलान हो गया है,
हर आदमी अब कितना बेजान हो गया है।।
बाहर की आवो हवाओं ने बदले है जब से मिजाज,
जिधर भी देखिए सब अनजान सा हो गया है।।
चंद दिनों पहले कुछ लोग लगा रहे थे आजादी के नारे यहां,
मौत के खोफ से हर आदमी घरों में कैद हो गया है।।
परमाणु बम हाथो में लेकर फिरने वाले हमारे पड़ोसी,
खोफ्जदा होकर कह रहे हैं जीना मुश्किल हो गया है।।
ऐसे भी दिन देखने होगे किसे मालूम था राही,
तेरे एक इशारे से कायनात में कोहराम सा मच गया है ।।

गौरतलब हो कि डॉक्टर राही द्वारा पूर्व मे भी अपनी बेहतरीन रचनाओं से सामाजिक बुराइयों एवं कुरीतियों को दूर भगाने तथा समाज में अच्छाइयों की फिजां महकाने का काम किया है। ऐसी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण समाज इनका ऋणी है।

 

इबादत की पैमाईश कोई इंसान ना करें,

घर पर रह कर ही अपने रब को याद करें ।।

मंदिर,मस्जिद,चर्च,गुरुद्वारे आस्था का ठिकाना है
फरियाद नेक दिल से करो क्या दिखाना है।।

रब का अभी इसे फरमान मान ले इंसान,
दूरियां बना कर ही करें मेरा इबादत इंसान ।।

कोई भूखे ना सोए, इंसानियत को हम बचाए,
भेद भाव को मिटा कर प्रेम की गंगा बहाए।।

कायनात की हालत पर अब तो विचारो राही,
चारो तरफ हाहाकार मचा है कैसी ये तबाही ।।

 

बेवजह घर से यूं ही निकला ना करो,
बाहर की हवा है जालिम उससे उलझा ना करो ।।

घर में भी पड़े है हजारों काम बाकी,
आईस्टा आईस्ता ही सही निबटा दिया करो ।।

फूलों की क्यारियां पड़ी है कई दिनों से प्यासी,
हर सुबह शाम इसको तो पानी पिलाया करो ।।

दाराजो की किताबें कब से उलझी पड़ी है,
होले होले ही सही उसको सजाया करो ।।

दीवारों पे टंगी पुरखों की तस्वीरें कह रही,
धूल से भरे पड़े है चहरे इनका सफाया करो ।।

बचपन के दिन भी कितने सुहाने थे राही”
आंगन में हरखू बाबा से कहते नई कहानी सुनाया करो ।।

 

 

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